लंबे दिन, बेहतर मानसिक संतुलन—डॉ. कुडियाल ने समझाया समर साइकोलॉजी

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नेशनल/भारत में गर्मियों का नाम आते ही दिमाग में तपती सड़कें, लू के थपेड़े और थकान भरी दिनचर्या की तस्वीर उभरती है। लेकिन क्या सच में गर्मियां सिर्फ परेशान करने वाला मौसम हैं?
अगर इस सवाल का जवाब विज्ञान से पूछा जाए, तो तस्वीर बिल्कुल उलट सामने आती है।

चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के यूनिवर्सिटी इंस्टिट्यूट ऑफ एलाइड हेल्थ साइंसेज में सहायक प्रोफेसर डॉ. सिद्धार्थ कुडियाल इस धारणा को सिरे से खारिज करते हैं। उनका स्पष्ट कहना है—
“गर्मियां शरीर का नेचुरल हीलिंग और रिचार्ज सीजन हैं, जिसे हमने गलत तरीके से समझ लिया है।”

 

धूप: दुश्मन नहीं, शरीर का ‘विटामिन फैक्ट्री’

गर्मियों की धूप को अक्सर खतरे के रूप में देखा जाता है, जबकि यही धूप शरीर में विटामिन D का सबसे बड़ा स्रोत है।
जब त्वचा सूर्य की UV-B किरणों के संपर्क में आती है, तो शरीर खुद विटामिन D बनाता है—जो हड्डियों, इम्युनिटी और मानसिक संतुलन के लिए बेहद जरूरी है।

आज की ‘इनडोर लाइफस्टाइल’ में यह तथ्य और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जहां लोग धूप से बचते-बचाते अपनी सेहत से समझौता कर बैठते हैं।

 

पसीना: असुविधा नहीं, शरीर की ‘इनबिल्ट क्लीनिंग सिस्टम’

गर्मियों में आने वाला पसीना अक्सर परेशानी लगता है, लेकिन असल में यह शरीर की सबसे प्राकृतिक और प्रभावी प्रक्रिया है।

डॉ. कुडियाल के अनुसार—
“पसीना शरीर का डिटॉक्स मैकेनिज्म है, जो तापमान संतुलित रखने के साथ-साथ अनावश्यक तत्वों को बाहर निकालता है।”

यानी, जो हम असहजता समझते हैं, वही शरीर को भीतर से साफ और सक्रिय बना रहा होता है।

 

गर्मियों का आहार: प्रकृति का ‘हेल्थ पैकेज’

इस मौसम में शरीर खुद हल्के और पानी से भरपूर आहार की मांग करता है।
तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी—ये सिर्फ फल नहीं, बल्कि शरीर के लिए प्राकृतिक ‘हाइड्रेशन किट’ हैं।

ये न केवल पानी की कमी पूरी करते हैं, बल्कि इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखते हुए पाचन और मेटाबॉलिज्म को भी बेहतर बनाते हैं।

 

लंबे दिन, बेहतर मूड: गर्मियों की ‘माइंड थेरेपी’

गर्मियों के लंबे दिन और अधिक रोशनी शरीर में सेरोटोनिन के स्तर को बढ़ाते हैं—जो ‘फील गुड हार्मोन’ के रूप में जाना जाता है।

इसके साथ ही, आउटडोर गतिविधियां—योग, खेल, वॉक—एंडोर्फिन रिलीज करती हैं, जो तनाव को कम कर प्राकृतिक खुशी का अहसास कराती हैं।

 

सावधानी जरूरी: संतुलन ही असली कुंजी

हालांकि, हर लाभ के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।
अत्यधिक गर्मी, लू और डिहाइड्रेशन से बचने के लिए—

पर्याप्त पानी पीना

हल्के और ढीले कपड़े पहनना

दोपहर की तेज धूप से बचना

नियमित अंतराल पर तरल पदार्थ लेना,ये सभी जरूरी उपाय हैं।

 

निष्कर्ष: नजरिया बदलिए, मौसम नहीं

गर्मियां बदलने वाली नहीं हैं, लेकिन उन्हें देखने का हमारा नजरिया जरूर बदल सकता है।

डॉ. सिद्धार्थ कुडियाल के शब्दों में—
“अगर हम गर्मियों को समझ लें, तो यही मौसम शरीर और मन को सबसे ज्यादा मजबूत बना सकता है।”

स्पष्ट है—
गर्मियां सिर्फ तपिश नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक अवसर हैं—स्वास्थ्य, ऊर्जा और संतुलित जीवन की ओर बढ़ने का।

परिचय :-
डॉ. सिद्धार्थ कुडियाल
एमपीटी (न्यूरोलॉजी), पीएच.डी. (शोधार्थी)
सहायक प्रोफेसर, यूनिवर्सिटी इंस्टिट्यूट

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