डोईवाला/देहरादून । बदलती स्वास्थ्य चुनौतियों के बीच योग, आधुनिक चिकित्सा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और डीएनए आधारित अनुसंधान को एक साझा मंच पर लाने की दिशा में मंगलवार को हिमालयन इंस्टीट्यूट हॉस्पिटल ट्रस्ट (हिम्स) परिसर स्थित स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय (एसआरएचयू) में राष्ट्रीय स्तर की हाइब्रिड कार्यशाला आयोजित की गई। हिम्स के स्कूल ऑफ योगा साइंसेज और इंडियन काउंसिल ऑफ फिलॉसफिकल रिसर्च (आईसीपीआर) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यशाला में देशभर से जुड़े विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था केवल उपचार तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि योग, विज्ञान और तकनीक के समन्वय पर आधारित होगी।
कार्यशाला का उद्घाटन दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। हिम्स के कुलपति डॉ. राजेंद्र डोभाल ने कहा कि योग को वैज्ञानिक कसौटी पर परखते हुए अनुसंधान के नए आयाम विकसित करना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान का समन्वय वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली को नई दिशा दे सकता है। उन्होंने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) तथा डीईपीएएस द्वारा सैन्य बलों के लिए किए जा रहे योग आधारित अनुसंधानों का भी उल्लेख किया।
प्रति कुलपति डॉ. अशोक कुमार देवरारी ने कहा कि हिम्स में इंटीग्रेटिव मेडिसिन के क्षेत्र में हो रहे शोध भविष्य की चिकित्सा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण आधार तैयार कर रहे हैं। उन्होंने युवा शोधार्थियों से योग और आधुनिक चिकित्सा के बीच वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित अनुसंधान को गति देने का आह्वान किया।
विशेषज्ञ व्याख्यान सत्र में एम्स नई दिल्ली की डॉ. रीमा दादा ने योग के डीएनए स्तर पर पड़ने वाले प्रभावों से जुड़े शोध निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए बताया कि योग केवल मानसिक या शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि जैविक स्तर पर भी सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है। जेएनयू के डॉ. विक्रम सिंह ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता और योग अनुसंधान के एकीकरण पर प्रकाश डालते हुए कहा कि एआई भविष्य में योग आधारित चिकित्सा के प्रभावों के विश्लेषण और सटीक शोध का महत्वपूर्ण उपकरण बनेगा। वहीं, बालाजी विद्यापीठ, पुडुचेरी के डॉ. आनंद बालयोगी भावनानी ने महर्षि पतंजलि के योग दर्शन को आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़ते हुए योग की दार्शनिक और व्यावहारिक उपयोगिता पर विस्तार से विचार रखे।
कार्यक्रम के प्रारंभ में हिम्स के स्कूल ऑफ योगा साइंसेज के प्राचार्य डॉ. सुबोध सौरभ सिंह ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि योग अनुसंधान को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग अनिवार्य है। कार्यशाला की संयोजिका डॉ. गरिमा जायसवाल ने धन्यवाद ज्ञापित किया, जबकि संचालन मुस्कान कपूर और दिया पोखरियाल ने संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के अधिकारी, संकाय सदस्य, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में प्रतिभागी उपस्थित रहे।
