जब डॉ. धस्माना ने याद किए खंडूड़ी— कहा राजनीति में ईमानदारी की वह आखिरी ऊँची दीवार

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डोईवाला/देहरादून। कुछ व्यक्तित्व केवल राजनीतिक पदों से नहीं पहचाने जाते, वह अपने आचरण, अनुशासन और सार्वजनिक जीवन की मर्यादा से इतिहास में दर्ज होते हैं। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी का निधन भी एक ऐसे ही युग के शांत अवसान की तरह महसूस किया जा रहा है, जिसने राजनीति को सेवा का माध्यम माना और प्रशासन को राष्ट्रधर्म की तरह जिया।

स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय (एसआरएचयू) जौलीग्रांट के अध्यक्ष डॉ. विजय धस्माना ने पूर्व CM खंडूड़ी के निधन पर गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए उन्हें “कर्तव्यनिष्ठ राजनीति का जीवंत प्रतीक” बताया। उनके शब्दों में केवल शोक नहीं था, बल्कि उस पीड़ा का स्पंदन भी था, जो किसी बड़े व्यक्तित्व के चले जाने पर समाज की चेतना में उतरती है।

डॉ. धस्माना ने कहा कि पूर्व CM खंडूड़ी का जीवन सत्ता के वैभव का नहीं, बल्कि सेवा के संस्कार का उदाहरण था। सेना की वर्दी से लेकर लोकतंत्र के सर्वोच्च मंचों तक उन्होंने जिस ईमानदारी, सादगी और अनुशासन का परिचय दिया, वह आज की राजनीति के लिए आदर्श पाठशाला है। उन्होंने कहा कि खंडूड़ी उन विरले नेताओं में थे, जिनकी उपस्थिति भरोसा जगाती थी और जिनकी वाणी में प्रशासनिक दृढ़ता के साथ मानवीय संवेदना भी दिखाई देती थी।

उन्होंने भावुक होकर उस ऐतिहासिक क्षण को भी स्मरण किया, जब वर्ष 2003 में एचआईएचटी संस्थापक स्वामी राम के महासमाधि दिवस पर पहली बार ‘स्वामी राम मानवता पुरस्कार’ की शुरुआत हुई थी। उस गरिमामयी अवसर पर खंडूड़ी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे और प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा को सम्मानित किया गया था। डॉ. धस्माना ने कहा कि उस दिन खंडूड़ी के व्यक्तित्व में उन्होंने सत्ता से अधिक संवेदना और पद से अधिक विनम्रता देखी थी।

डॉ. धस्माना ने कहा कि खंडूड़ी का संस्थान के प्रति सदैव आत्मीय जुड़ाव रहा। संस्थान के विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर उनका दृष्टिकोण बेहद सकारात्मक और प्रेरणादायी था। समय-समय पर उनका मार्गदर्शन संस्थान के लिए ऊर्जा का स्रोत बनता रहा।

उन्होंने कहा कि देश के सड़क नेटवर्क को आधुनिक स्वरूप देने में खंडूड़ी का योगदान सदैव स्वर्णाक्षरों में याद किया जाएगा। ‘स्वर्णिम चतुर्भुज योजना’ को जिस प्रशासनिक दृढ़ता और दूरदर्शिता के साथ उन्होंने गति दी, उसने भारत की आधारभूत संरचना को नई पहचान दी।

डॉ. धस्माना के शब्दों में, “खंडूड़ी केवल एक राजनेता नहीं थे, वह सार्वजनिक जीवन की उस गरिमा का नाम थे, जिसे आज भी लोग आदर से याद करते हैं। उनका जाना सचमुच एक युग का मौन हो जाना है।”

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